सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

How democracy is being used to make people consumers of political party in rule

By Harasankar Adhikari 

How is Indian democracy? Is it today in distress or in a fatal condition? Are all the activities of the government not enough to rethink the status of Indian democracy? Does it not try to make people consumers or beneficiaries of the political party in the rule? Dole has become the prime driver/determined factor of selling or buying people's democratic rights (right to vote).
Now a populist government rules the state of West Bengal. Its populism is confined within multifarious dole (dole-oriented different schemes - from ‘Shrees’ (i.e. Kanyashree, Yubashree, etc. to ‘Sathis (i.e. Kadhya Sathi, Swasthya Sathi, etc.’ to the latest ‘Lakshmi Bhandar’) to its supporters, whether rich or poor. This government only publicises its success for the last 10 years with the celebration of different dole giving ceremonies. Is it dole or alms? This state has already borrowed six lakh crore rupees within two decades of its rule. The exercise duty through the sale of liquor is the only dominant avenue of generating revenues.
The political party in control of this state is ironically determined to make the people of this state dependent on it. It works to make people idle, which would be harmful to society. The beneficiaries of this state have no jobs. The only job is confined to the tag of “doing party”. The political party in power has taken the initiative to reach the government at the doorstep and dole to be reached at the doorstep. People would enjoy only their rights at home. But all of these benefits are not for non-supporters, whether they are eligible for these benefits or not. No-supporters have to face police at their doorstep.
A democracy always battles for equity and justice for all. The political party that rules makes a difference among people from household to household, community to community, if anyone does not support this political party or if anyone raises their voice against the acts of this political party.
It is a fact that this government has failed to strengthen or revive the basic index of social, economic and cultural development. Only a culture of corruption from top to bottom of the ruling political party's hierarchy is significant. Corruption is multilayered (college admission, pensions for the poor, disaster relief, and so on). Corruption has become a daily matter in every sphere of governmental activities. Now corruption is at the doorstep.
Abolition of governmental jobs, rampant corruption in teachers’ employment (from primary to university level), no industry, no investment are some of the most important failures of this government. But this government shows that it has facilitated super success. After taking charge for the third term, it is more desperate to sanctify all its activities. False promises have become the pillar of success in the polls.
Creating job opportunities is preferable to making people dole dependents in order to ensure the dominance of the ruling political party. Self-dependency would promote democratic self-choices. To kill this, it strategically approaches the target of dole for votes. But who would stop or rectify them? This state will face a dangerous situation in the very near future.

टिप्पणियाँ

ट्रेंडिंग

हिंदी आलोचना जैसे पिछड़ चुके अनुशासन की जगह हिंदी वैचारिकी का विकास जरूरी

- प्रमोद रंजन*   भारतीय राजनीति में सांप्रदायिक व प्रतिक्रियावादी ताकतों को सत्ता तक पहुंचाने में हिंदी पट्टी का सबसे बड़ा योगदान है। इसका मुख्य कारण हिंदी-पट्टी में कार्यरत समाजवादी व जनपक्षधर हिरावल दस्ते का विचारहीन, अनैतिक और  प्रतिक्रियावादी होते जाना है। अगर हम उपरोक्त बातों को स्वीकार करते हैं, तो कुछ रोचक निष्कर्ष निकलते हैं। हिंदी-जनता और उसके हिरावल दस्ते को विचारहीन और प्रतिक्रियावादी बनने से रोकने की मुख्य ज़िम्मेदारी किसकी थी?

नफरती बातें: मुसलमानों में असुरक्षा का भाव बढ़ रहा है, वे अपने मोहल्लों में सिमट रहे हैं

- राम पुनियानी*  भारत पर पिछले 10 सालों से हिन्दू राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) राज कर रही है. भाजपा आरएसएस परिवार की सदस्य है और आरएसएस का लक्ष्य है हिन्दू राष्ट्र का निर्माण. आरएसएस से जुड़ी सैंकड़ों संस्थाएँ हैं. उसके लाखों, बल्कि शायद, करोड़ों स्वयंसेवक हैं. इसके अलावा कई हजार वरिष्ठ कार्यकर्ता हैं जिन्हें प्रचारक कहा जाता है. भाजपा के सत्ता में आने के बाद से आरएसएस दुगनी गति से हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के अपने एजेण्डे को पूरा करने में जुट गया है. यदि भाजपा को चुनावों में लगातार सफलता हासिल हो रही है तो उसका कारण है देश में साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिक मुद्दों का बढ़ता बोलबाला. इनमें से कुछ हैं राम मंदिर, गौमांस और गोवध एवं लव जिहाद. 

देशव्यापी ग्रामीण भारत बंध में उतरे मध्य प्रदेश के आदिवासी, किया केंद्र सरकार का विरोध

- हरसिंग जमरे, भिखला सोलंकी, रतन अलावे*  15 और 16 फरवरी को निमाड के बड़वानी, खरगोन और बुरहानपुर में जागृत आदिवासी दलित संगठन के नेतृत्व में आदिवासी महिला-पुरुषों ग्रामीण भारत बंद में रैली एवं विरोध प्रदर्शन किया । प्रधान मंत्री द्वारा 2014 में फसलों की लागत का डेढ़ गुना भाव देने का वादा किया गया था, 2016 में किसानों की आय दुगना करने का वादा किया गया था । आज, फसलों का दाम नहीं बढ़ रहा है, लेकिन खेती में खर्च बढ़ता जा रहा है! खाद, बीज और दवाइयों का दाम, तीन-चार गुना बढ़ चुका है! किसानों को लागत का डेढ़ गुना भाव देने के बजाए, खेती को कंपनियों के हवाले करने के लिए 3 काले कृषि कानून लाए गए । 3 काले कानून वापस लेते समय प्रधान मंत्री ने फिर वादा किया था कि फसलों की लागत का डेढ़ गुना भाव की कानूनी गारंटी के लिए कानून बनाएँगे, लेकिन वो भी झूठ निकला! आज जब देश के किसान दिल्ली में आपको अपना वादा याद दिलाने आए है, तब आप उनका रास्ता रोक रहें है, उनके साथ मारपीट कर उन पर आँसू गैस फेंक रहें हैं, उन पर छर्रों से फायरिंग कर रहें है! देश को खिलाने वाला किसान खुद भूखा रहे, क्या यही विकास है?

18થી નાની ઉંમરના 1,15,129 બાળકો શાળા બહાર? વાસ્તવિક આંકડો 15-20 ગણો વધું

- સુખદેવ પટેલ*  16 એપ્રિલથી સમગ્ર ગુજરાતમાં શાળા બહારના 6 થી 19 વર્ષની ઉંમરના બાળકોનો સર્વે શરૂ થયો છે.  જે 26 એપ્રિલ સુધી ચાલશે. જેની જવાબદારી સરકારી શાળાના શિક્ષકોને સોંપવામાં આવી છે. અત્યારે પ્રાથમિક શાળાઓમાં વાર્ષિક પરીક્ષાઓ ચાલી રહી છે. લોકસભાની ચૂંટણીઓના કામ પણ શિક્ષકોને ભાગે કરવાના આવશે. શિક્ષકો કેટલું કરી શક્શે? શિક્ષકો પાસેથી વ્યાજબી રીતે કેટલી અપેક્ષાઓ રાખવી જોઈએ? RTE ની જોગવાઈઓ મુજબ દરેક બાળક શિક્ષણ મેળવી શકે, તે માટે શાળા બહારના બાળકોને સર્વે કરીને શોધી કાઢવાનું ઉમદા કામ સરકાર વિચારે છે, તે આવકારદાયક છે. આવાં ઉત્તમ કામમાં જેમને સીધો લાભ થવાનો છે,  તેવાં હિતધારકોની પ્રતિનિધિ સમિતિ SMC સ્કૂલ મેનેજમેન્ટ કમિટી આ જવાબદારી સારી રીતે ઉપાડી શકે તેમ છે. શિક્ષણ વિભાગ SSA તરફથી આ કામગીરીમાં SMC ની ભાગીદારીનું આયોજન કરીને યોગ્ય માર્ગદર્શિકા તૈયાર કરવી જોઈએ.

How the slogan Jai Bhim gained momentum as movement of popularity and revolution

By Dr Kapilendra Das*  India is an incomprehensible plural country loaded with diversities of religions, castes, cultures, languages, dialects, tribes, societies, costumes, etc. The Indians have good manners/etiquette (decent social conduct, gesture, courtesy, politeness) that build healthy relationships and take them ahead to life. In many parts of India, in many situations, and on formal occasions, it is common for people of India to express and exchange respect, greetings, and salutation for which we people usually use words and phrases like- Namaskar, Namaste, Pranam, Ram Ram, Jai Ram ji, Jai Sriram, Good morning, shubha sakal, Radhe Radhe, Jai Bajarangabali, Jai Gopal, Jai Jai, Supravat, Good night, Shuvaratri, Jai Bhole, Salaam walekam, Walekam salaam, Radhaswami, Namo Buddhaya, Jai Bhim, Hello, and so on.

Laxmanpur Bathe massacre: Perfect example of proto-fascist Brahmanical social order

By Harsh Thakor  The massacre at Laxmanpur-Bathe of Jehanabad in Bihar on the night of 1 December in 1997 was a landmark event with distinguishing features .The genocide rightly shook the conscience of the nation in the 50th year of Indian independence. The scale of the carnage was unparalleled in any caste massacre. It was a perfect manifestation of how in essence the so called neo-liberal state was in essence most autocratic. 

स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने के बजाय बीमा आधारित सेवाओं को प्राथमिकता क्यों?

- राष्ट्रीय स्वास्थ्य अधिकार अभियान  वैश्विक स्तर पर “विश्व स्वास्थ्य दिवस” इस साल “हमारा स्वास्थ्य, हमारा अधिकार” की अवधारणा को केन्द्रित कर मनाया जा रहा है। इस उपलक्ष्य में राष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य अधिकार संघर्ष को मजबूत करने के लिए, संवैधानिक और नीतिगत रूप में स्वास्थ्य को मौलिक अधिकार बनाने के लिए, स्वास्थ्य के विभिन्न आयामों को लोगों के हक के लिए संगठित करने, जागरूक करने और स्वास्थ्य के मानकों पर कार्य करने हेतु तथा सरकार को जनता के प्रति जिम्मेदार बनाने हेतु जन आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय ने स्वास्थ्य अधिकार अभियान के माध्यम से जनता के पक्ष को मजबूत करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य अधिकार के मुद्दे पर सक्रिय रूप से कार्य करेगा।

અમદાવાદ પોલિસ કમિશનરનું જાહેરનામું: નાગરિક સ્વાતંત્ર્ય પર તરાપ મારવાની પ્રક્રિયાનો એક ભાગ

- હેમંતકુમાર શાહ  અમદાવાદના પોલિસ કમિશનરનું લોકશાહી વિરોધી વધુ એક પગલું ચૂંટણી ટાણે જોવા મળ્યું છે.   તા. ૧૬-૦૪-૨૦૨૪ના રોજ તેમણે એક જાહેરનામું બહાર પાડીને ફોજદારી કાર્યવાહી અધિનિયમ-૧૯૭૩ની કલમ-૧૪૪ આખા શહેરમાં લાગુ કરી જણાવ્યું છે કે "કોઈ પણ પ્રચારપ્રસાર રેલી દરમ્યાન કોઈ એ કાળા વાવટા ફરકાવવા નહિ કે ઉશ્કેરણીજનક બેનર કે પ્લે કાર્ડ બતાવવું નહિ અથવા કોઈ વિરોધમાં ઉશ્કેરણીજનક સૂત્રોચ્ચાર કરવો નહિ."

न नौकरियाँ, न पर्याप्त मजदूरी, न राहत: अनौपचारिक श्रमिकों के लिए मोदी की विरासत

- प्रतिनिधि द्वारा  भारत में वास्तविक मज़दूरी 2014-15 के बाद से नहीं बढ़ी है, जबकि देश की जीडीपी जरूर बेहतर हुई है। इस दौरान देश की सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था भी थम सी गई है। देश के अनौपचारिक श्रमिकों का जीवन बेहद अनिश्चित है, खासकर झारखंड जैसे राज्यों में जहां अनौपचारिक रोजगार लाखों लोगों की आजीविका का मुख्य स्रोत है।

क्या कांग्रेस का घोषणापत्र मुस्लिम लीग की सोच को प्रतिबिंबित करता है?

- राम पुनियानी गत 4 अप्रैल 2024 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 2024 के आमचुनाव के लिए अपना घोषणापत्र जारी किया. पार्टी ने इसे 'न्याय पत्र' का नाम दिया है. इसमें जाति जनगणना, आरक्षण पर 50 प्रतिशत की ऊपरी सीमा हटाने, युवाओं के लिए रोज़गार, इंटर्नशिप की व्यवस्था, गरीबों के लिए आर्थिक मदद आदि का वायदा किया गया है. घोषणापत्र का फोकस महिलाओं, आदिवासियों, दलितों, ओबीसी, किसानों और युवाओं व विद्यार्थियों के लिए न्याय पर है. कांग्रेस के एक प्रवक्ता ने कहा कि घोषणापत्र यह वादा करता है कि भाजपा के पिछले 10 सालों के शासनकाल में समाज के विभिन्न तबकों के साथ हुए अन्याय को समाप्त किया जाएगा.