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यह ब्लॉग राजनीतिक मामलों से लेकर पर्यावरणीय समस्याओं, नेतृत्व की चुनौतिओं, समाज में कला की भूमिकाओं, जाति और वर्ग के मुद्दों, वगैरा पर अपनी बात रखने को प्रोत्साहित करता है। 
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हिंदी आलोचना जैसे पिछड़ चुके अनुशासन की जगह हिंदी वैचारिकी का विकास जरूरी

- प्रमोद रंजन*   भारतीय राजनीति में सांप्रदायिक व प्रतिक्रियावादी ताकतों को सत्ता तक पहुंचाने में हिंदी पट्टी का सबसे बड़ा योगदान है। इसका मुख्य कारण हिंदी-पट्टी में कार्यरत समाजवादी व जनपक्षधर हिरावल दस्ते का विचारहीन, अनैतिक और  प्रतिक्रियावादी होते जाना है। अगर हम उपरोक्त बातों को स्वीकार करते हैं, तो कुछ रोचक निष्कर्ष निकलते हैं। हिंदी-जनता और उसके हिरावल दस्ते को विचारहीन और प्रतिक्रियावादी बनने से रोकने की मुख्य ज़िम्मेदारी किसकी थी?

नरेन्द्र मोदी देवत्व की ओर? 1923 में हिटलर ने अपनी तुलना भी ईसा मसीह से की थी

- राम पुनियानी*  समाज के संचालन की प्रजातान्त्रिक प्रणाली को मानव जाति ने एक लम्बे और कठिन संघर्ष के बाद हासिल किया. प्रजातंत्र के आगाज़ के पूर्व के समाजों में राजशाही थी. राजशाही में राजा-सामंतों और पुरोहित वर्ग का गठबंधन हुआ करता था. पुरोहित वर्ग, धर्म की ताकत का प्रतिनिधित्व करता था. राजा को ईश्वर का प्रतिरूप बताया जाता था और उसकी कथनी-करनी को पुरोहित वर्ग हमेशा उचित, न्यायपूर्ण और सही ठहराता था. पुरोहित वर्ग ने बड़ी चतुराई से स्वर्ग (हैवन, जन्नत) और नर्क (हैल, जहन्नुम) के मिथक रचे. राजा-पुरोहित कॉम्बो के आदेशों को सिर-आँखों पर रखने वाला पुण्य (सबाब) करता है और इससे उसे पॉजिटिव पॉइंट मिलते हैं. दूसरी ओर, जो इनके आदेशों का उल्लंघन करता है वह पाप (गुनाह) करता है और उसे नेगेटिव पॉइंट मिलते हैं. व्यक्ति की मृत्यु के बाद नेगेटिव और पॉजिटिव पॉइंटों को जोड़ कर यह तय किया जाता है कि वह नर्क में सड़ेगा या स्वर्ग में आनंद करेगा.

ગુજરાતી સાહિત્યકારો જોગ એક ખુલ્લો પત્ર: અરુંધતિ રોય અને સાહિત્યકારની સ્વતંત્રતા

- પ્રો. હેમંતકુમાર શાહ*  માનનીય સાહિત્યકારશ્રીઓ, નમસ્કાર. અર્થશાસ્ત્ર અને રાજ્યશાસ્ત્રનો વિદ્યાર્થી હોવા છતાં હું ગુજરાતી, હિન્દી અને વૈશ્વિક સાહિત્યનો ચાહક અને વાચક હોવાને નાતે આપ સૌને વિનમ્રભાવે આ ખુલ્લો પત્ર લખી રહ્યો છું. આપને સલાહ આપવાની મારી કોઈ ઓકાત નથી પણ આપ સામે આક્રોશ અને વેદના વ્યક્ત કરી રહ્યો છું.

साहित्य बोध में परिवर्तन: सत्तर के दशक में विचारधारा का महत्व बहुत अधिक था

- अजय तिवारी   सत्तर के बाद वाले दशक में जब हम लोग साहित्य में प्रवेश कर रहे थे तब दाढ़ी रखने, बेतरतीबी से कपड़े पहनने और फक्कड़पन का जीवन जीने वाले लोग बेहतर लेखक हुआ करते थे या बेहतर समझे जाते थे। नयी सदी में चिकने-चुपड़े, बने-ठने और खर्चीला जीवन बिताने वाले सम्मान के हक़दार हो चले हैं। यह फ़र्क़ जनवादी उभार और भूमण्डलीय उदारीकरण के बीच का सांस्कृतिक अंतर उजागर करता है। 

एनडीए सरकार में हिन्दू राष्ट्रवाद की दिशा: मुसलमानों का हाशियाकरण जारी रहेगा

- राम पुनियानी*  लोकसभा आमचुनाव में भाजपा के 272 सीटें हासिल करने में विफल रहने के बाद एनडीए एक बार फिर नेपथ्य से मंच के केंद्र में आ गया है. सन 1998 में अटलबिहारी वाजपेई एनडीए सरकार के प्रधानमंत्री बने थे. उस सरकार के कार्यकलापों पर भी भाजपा की राजनीति का ठप्पा था. उस सरकार ने हिंदुत्व के एजेंडे के अनुरूप संविधान की समीक्षा के लिए वेंकटचलैया आयोग नियुक्त किया, पाठ्यपुस्तकों का भगवाकरण किया और ज्योतिषशास्त्र व पौरोहित्य को विषय के रूप में पाठ्यक्रम में जोड़ा. सन 2014 और 2019 में बनी मोदी सरकारें तकनीकी दृष्टि से भले ही एनडीए की सरकारें रही हों मगर चूँकि भाजपा को अपने दम पर बहुमत हासिल था इसलिए अन्य घटक दल साइलेंट मोड में बने रहे और भाजपा ने बिना रोकटोक अपना आक्रामक हिन्दू राष्ट्रवादी एजेंडा लागू किया. इसमें शामिल था राममंदिर का निर्माण और अनुच्छेद 370 का कश्मीर से हटाया जाना. इसके अलावा सरकार की मौन सहमति से गाय और बीफ के नाम पर मुसलमानों की लिंचिंग की गयी और लव जिहाद और न जाने कितने अन्य किस्मों के जिहादों की बातें की गईं.

ગુજરાતમાં શહેરોને સમકક્ષ ગામડાઓના વીકાસની પબ્લીક ડીમાન્ડ કેમ ઉભી નથી થતી

- કિરણ ત્રિવેદી  હું 1982માં વડોદરાથી ભણીને અમદાવાદમાં સેટલ થવા આવેલો, ત્યારે અમદાવાદ શહેરની વસ્તી 26 લાખ હતી. ત્યારે પણ અમદાવાદ શહેર ગીચ અને અનમેનેજેબલ લાગતું હતું. 20 વર્ષ પછી 2002 આસપાસ શહેરની વસ્તી ડબલ થઈ ગઈ હતી! 52 લાખની! આજે 2024માં વસ્તી અંદાજે 90 લાખની ગણાય છે!

ત્રણ નવા ફોજદારી કાયદાનો અમલ મોકૂફ રાખવા બાબતે સંબંધિત નાગરિકો તરફથી અપીલ...

- રમેશ સવાણી*  ચાલો, નાગરિક ધર્મ નિભાવીએ!  શ્રી એન.ચંદ્રબાબુ નાયડુ8 પ્રમુખ, તેલુગુ દેશમ પાર્ટી ને પત્ર. વિષય : ત્રણ નવા ફોજદારી કાયદાનો અમલ મોકૂફ રાખવા બાબતે સંબંધિત નાગરિકો તરફથી અપીલ...  ***