Skip to main content

Socially disadvantaged groups in Gujarat have lower purchasing power than other states

By Rajiv Shah* 
Fresh data released by the National Sample Survey Organization (NSSO) in the report “Household Consumer Expenditure across Socio-Economic Groups” have suggested the purchasing power of the three socially disadvantaged groups – scheduled tribes (STs), scheduled castes (SCs) and other backward classes (OBCs) – in Gujarat is considerably less than what prevails in most of the Indian states, especially in the rural areas. Calculated as monthly per capita expenditure (MPCE), purchasing power figures are based on NSSO’s survey in 2011-12. The report was released in February 2015.
In Gujarat’s rural areas, the STs’ average MPCE is Rs 1,155, which is less than 12 out of 20 major Indian states (Punjab, Himachal Pradesh, Kerala, Jammu & Kashmir, Haryana, Uttarakhand, Andhra Pradesh, Karnataka, Assam, Tamil Nadu, Rajasthan and Maharashtra). The SCs’ average MPCE is Rs 1,374, which is less than 11 major states (Kerala, Punjab, Jammu & Kashmir, Haryana, Himachal Pradesh, Andhra Pradesh, Maharashtra, Tamil Nadu, Uttarakhand, Karnataka and Rajasthan). And the OBCs’ average MPCE is Rs 1,582, which is less than 11 major Indian states (Kerala, Punjab, Haryana, Himachal Pradesh, Tamil Nadu, Andhra Pradesh, Jammu & Kashmir, Rajasthan, Maharashtra, Uttarakhand, Karnataka).
The pattern also suggests the obvious detail, that the STs’ purchasing power in rural India, as in Gujarat, is considerably less than the other two disadvantaged groups, SCs and OBCs.
As for “Others” in rural Gujarat – mainly consisting of upper castes – their average MPCE, at Rs 1,988, is found to be not just higher than the three disadvantaged groups. It is also higher than all 20 major states but five – Kerala (Rs 3,156), Punjab (Rs 3,009), Haryana (Rs 2,531), Himachal Pradesh (Rs 2,255), and Rajasthan (Rs 2,119).

The comparative data significantly suggest that all three disadvantaged groups in rural, STs, SCs and OBCs, are worse off than majority of other major states, but this is not the case with upper castes.
As for Gujarat’s urban areas, the pattern is quite different from the one that is prevailing in rural Gujarat. Here, STs’ and OBCs’ MPCE is worse than majority of Indian states, but this is not true for SCs.
Comparative figures suggest that STs’ MPCE in urban Gujarat at Rs 2,014 is less than 12 other states (Haryana, Himachal Pradesh, Punjab, Kerala, Uttarakhand, Andhra Pradesh, West Bengal, Jammu & Kashmir, Rajasthan, Madhya Pradesh, Maharashtra and Jharkhand). This would possibly suggest that tribal migrants in urban areas, mainly working at construction sites, are more ill-paid in Gujarat than most of India.
As for SCs, their MPCE is quite high in urban Gujarat – Rs 2,359 – compared to most of the 20 major states but three (Himachal Pradesh, Maharashtra and Kerala). Presumably, this could be because a big section of Dalits living in the urban areas work in government of semi-government offices, with many of them able to gain from the reservation policy.
Interestingly, the urban Gujarat OBCs’ MPCE – Rs 2,086 – is not only less than that of the SCs but is only a little higher than the STs (Rs 2,014). Also, the urban Gujarat OBCs’ MPCE is lower than 12 other states (Himachal Pradesh, Jammu & Kashmir, Maharashtra, Kerala, Haryana, Tamil Nadu, Karnataka, Punjab, Andhra Pradesh, Assam, West Bengal and Rajasthan).
Those in the “Others” category in urban Gujarat, belonging to the upper castes, evidently, have a much higher MPCE (Rs 2,946) as compared to STs, SCs and OBCs. Yet, it is lower than eight other states– Kerala (Rs 5,376), Haryana (Rs 4,669), Karnataka (Rs 4,378), Maharashtra (Rs 3,699), Himachal Pradesh (Rs 3,329), Punjab (Rs 3,209), Andhra Pradesh Rs (3,080), and Chhattisgarh (Rs 2,980).

Comments

TRENDING

हिंदी आलोचना जैसे पिछड़ चुके अनुशासन की जगह हिंदी वैचारिकी का विकास जरूरी

- प्रमोद रंजन*   भारतीय राजनीति में सांप्रदायिक व प्रतिक्रियावादी ताकतों को सत्ता तक पहुंचाने में हिंदी पट्टी का सबसे बड़ा योगदान है। इसका मुख्य कारण हिंदी-पट्टी में कार्यरत समाजवादी व जनपक्षधर हिरावल दस्ते का विचारहीन, अनैतिक और  प्रतिक्रियावादी होते जाना है। अगर हम उपरोक्त बातों को स्वीकार करते हैं, तो कुछ रोचक निष्कर्ष निकलते हैं। हिंदी-जनता और उसके हिरावल दस्ते को विचारहीन और प्रतिक्रियावादी बनने से रोकने की मुख्य ज़िम्मेदारी किसकी थी?

साहित्य बोध में परिवर्तन: सत्तर के दशक में विचारधारा का महत्व बहुत अधिक था

- अजय तिवारी   सत्तर के बाद वाले दशक में जब हम लोग साहित्य में प्रवेश कर रहे थे तब दाढ़ी रखने, बेतरतीबी से कपड़े पहनने और फक्कड़पन का जीवन जीने वाले लोग बेहतर लेखक हुआ करते थे या बेहतर समझे जाते थे। नयी सदी में चिकने-चुपड़े, बने-ठने और खर्चीला जीवन बिताने वाले सम्मान के हक़दार हो चले हैं। यह फ़र्क़ जनवादी उभार और भूमण्डलीय उदारीकरण के बीच का सांस्कृतिक अंतर उजागर करता है। 

How Mahakavi Sri Sri defined political and cultural metamorphosis of Telugu society

By Harsh Thakor  Srirangam Srinivasarao, popularly known as Sri Sri, or called Mahakavi (The Great Poet), held a reputation like no other Telugu poet. Today, on June 15th, we commemorate his 40th death anniversary. Sri Sri transcended heights in revolutionary creativity or exploration, unparalleled, in Telegu poetry, giving it a new dimension. His poems projected the theme or plight of the oppressed people at a scale, rarely penetrated by poets, giving revolutionary poetry it’s soul.

Laxmanpur Bathe massacre: Perfect example of proto-fascist Brahmanical social order

By Harsh Thakor  The massacre at Laxmanpur-Bathe of Jehanabad in Bihar on the night of 1 December in 1997 was a landmark event with distinguishing features .The genocide rightly shook the conscience of the nation in the 50th year of Indian independence. The scale of the carnage was unparalleled in any caste massacre. It was a perfect manifestation of how in essence the so called neo-liberal state was in essence most autocratic. 

एनडीए सरकार में हिन्दू राष्ट्रवाद की दिशा: मुसलमानों का हाशियाकरण जारी रहेगा

- राम पुनियानी*  लोकसभा आमचुनाव में भाजपा के 272 सीटें हासिल करने में विफल रहने के बाद एनडीए एक बार फिर नेपथ्य से मंच के केंद्र में आ गया है. सन 1998 में अटलबिहारी वाजपेई एनडीए सरकार के प्रधानमंत्री बने थे. उस सरकार के कार्यकलापों पर भी भाजपा की राजनीति का ठप्पा था. उस सरकार ने हिंदुत्व के एजेंडे के अनुरूप संविधान की समीक्षा के लिए वेंकटचलैया आयोग नियुक्त किया, पाठ्यपुस्तकों का भगवाकरण किया और ज्योतिषशास्त्र व पौरोहित्य को विषय के रूप में पाठ्यक्रम में जोड़ा. सन 2014 और 2019 में बनी मोदी सरकारें तकनीकी दृष्टि से भले ही एनडीए की सरकारें रही हों मगर चूँकि भाजपा को अपने दम पर बहुमत हासिल था इसलिए अन्य घटक दल साइलेंट मोड में बने रहे और भाजपा ने बिना रोकटोक अपना आक्रामक हिन्दू राष्ट्रवादी एजेंडा लागू किया. इसमें शामिल था राममंदिर का निर्माण और अनुच्छेद 370 का कश्मीर से हटाया जाना. इसके अलावा सरकार की मौन सहमति से गाय और बीफ के नाम पर मुसलमानों की लिंचिंग की गयी और लव जिहाद और न जाने कितने अन्य किस्मों के जिहादों की बातें की गईं.

सदन की सबसे उंची गद्दी पर बैठे यह शख्स मर्यादाओं को अनदेखा कर मुंह फेरता रहा

- मनीष सिंह*   ओम बिड़ला को जब याद किया जाएगा, तो लोगों के जेहन मे भावहीन सूरत उभरेगी। सदन के सबसे उंची गद्दी पर बैठा शख्स, जो संसदीय मर्यादाओं को तार तार होते सदन मे अनजान बनकर  मुंह फेरता रहा।  मावलंकर, आयंगर, सोमनाथ चटर्जी और रवि राय ने जिस कुर्सी की शोभा बढाई, उसे उंचा मयार दिया.. वहीं ओम बिड़ला इस सदन की गरिमा की रक्षा मे अक्षम स्पीकर के रूप मे याद किये जाऐंगे। 

नरेन्द्र मोदी देवत्व की ओर? 1923 में हिटलर ने अपनी तुलना भी ईसा मसीह से की थी

- राम पुनियानी*  समाज के संचालन की प्रजातान्त्रिक प्रणाली को मानव जाति ने एक लम्बे और कठिन संघर्ष के बाद हासिल किया. प्रजातंत्र के आगाज़ के पूर्व के समाजों में राजशाही थी. राजशाही में राजा-सामंतों और पुरोहित वर्ग का गठबंधन हुआ करता था. पुरोहित वर्ग, धर्म की ताकत का प्रतिनिधित्व करता था. राजा को ईश्वर का प्रतिरूप बताया जाता था और उसकी कथनी-करनी को पुरोहित वर्ग हमेशा उचित, न्यायपूर्ण और सही ठहराता था. पुरोहित वर्ग ने बड़ी चतुराई से स्वर्ग (हैवन, जन्नत) और नर्क (हैल, जहन्नुम) के मिथक रचे. राजा-पुरोहित कॉम्बो के आदेशों को सिर-आँखों पर रखने वाला पुण्य (सबाब) करता है और इससे उसे पॉजिटिव पॉइंट मिलते हैं. दूसरी ओर, जो इनके आदेशों का उल्लंघन करता है वह पाप (गुनाह) करता है और उसे नेगेटिव पॉइंट मिलते हैं. व्यक्ति की मृत्यु के बाद नेगेटिव और पॉजिटिव पॉइंटों को जोड़ कर यह तय किया जाता है कि वह नर्क में सड़ेगा या स्वर्ग में आनंद करेगा.