Skip to main content

Israeli push for rooftop solar panels should be of huge relevance for India

By Shankar Sharma* 

A recent development indicating that "Israel will soon require all new non-residential buildings to have rooftop solar panels to help it meet renewable energy targets and the electricity demands of a fast-growing population" should be a hugely relevant lesson for India in its energy transition efforts.
It is also reported that: "Although drenched in sunshine, Israel is too small to rely on traditional, land-intensive photovoltaic power plants. It is also unsuitable for wind power and lacks water for hydropower. For residential buildings the roof must be fully equipped for easy installation of panels later on."
Whereas India can be said to have a huge land mass, as compared to Israel, it must also be noted that its land resources are already under considerable stress, and are continuing to be under increasing levels of stress since the last few decades. Land based RE power installations, such as large size solar power parks and wind power parks, are resulting in diversion of large chunks of lands, especially agricultural and forest lands. The fact that the total land area under the cover of forest & trees in our country is only about 22% of the total land area, as against the national forest policy target of 33% should be a deeply disconcerting factor in this larger context.
Hence, the humongous potential of roof top surface in the country must be fully appreciated and optimally harnessed for the sake of overall welfare of our communities. Whereas the amendment seeking to implement the Time-of-Day (TOD) metering system to optimise the usage of electricity across the country should be seen as a huge step in the right direction to accelerate the RE integration, massive incentives, including any financial incentives if necessary, has become critical and well as urgent to transform our power sector. As in the case of Israel, which requires all new non-residential buildings to have rooftop solar panels, India must enact suitable rules/ policies to encourage all new non-residential buildings as well as new residential buildings to have rooftop solar panels to bring down the losses in the power grid, and to reduce the STATE's burden on capital finance for power projects.
There is a need for civil society groups to persuade the Union govt. to provide adequate focus to encourage all new non-residential buildings as well as new residential buildings to have rooftop solar panels. The chronic issues in the power sector cannot be effectively addressed without such policies.
---
*Power & Climate Policy Analyst

Comments

TRENDING

हिंदी आलोचना जैसे पिछड़ चुके अनुशासन की जगह हिंदी वैचारिकी का विकास जरूरी

- प्रमोद रंजन*   भारतीय राजनीति में सांप्रदायिक व प्रतिक्रियावादी ताकतों को सत्ता तक पहुंचाने में हिंदी पट्टी का सबसे बड़ा योगदान है। इसका मुख्य कारण हिंदी-पट्टी में कार्यरत समाजवादी व जनपक्षधर हिरावल दस्ते का विचारहीन, अनैतिक और  प्रतिक्रियावादी होते जाना है। अगर हम उपरोक्त बातों को स्वीकार करते हैं, तो कुछ रोचक निष्कर्ष निकलते हैं। हिंदी-जनता और उसके हिरावल दस्ते को विचारहीन और प्रतिक्रियावादी बनने से रोकने की मुख्य ज़िम्मेदारी किसकी थी?

साहित्य बोध में परिवर्तन: सत्तर के दशक में विचारधारा का महत्व बहुत अधिक था

- अजय तिवारी   सत्तर के बाद वाले दशक में जब हम लोग साहित्य में प्रवेश कर रहे थे तब दाढ़ी रखने, बेतरतीबी से कपड़े पहनने और फक्कड़पन का जीवन जीने वाले लोग बेहतर लेखक हुआ करते थे या बेहतर समझे जाते थे। नयी सदी में चिकने-चुपड़े, बने-ठने और खर्चीला जीवन बिताने वाले सम्मान के हक़दार हो चले हैं। यह फ़र्क़ जनवादी उभार और भूमण्डलीय उदारीकरण के बीच का सांस्कृतिक अंतर उजागर करता है। 

How Mahakavi Sri Sri defined political and cultural metamorphosis of Telugu society

By Harsh Thakor  Srirangam Srinivasarao, popularly known as Sri Sri, or called Mahakavi (The Great Poet), held a reputation like no other Telugu poet. Today, on June 15th, we commemorate his 40th death anniversary. Sri Sri transcended heights in revolutionary creativity or exploration, unparalleled, in Telegu poetry, giving it a new dimension. His poems projected the theme or plight of the oppressed people at a scale, rarely penetrated by poets, giving revolutionary poetry it’s soul.

Laxmanpur Bathe massacre: Perfect example of proto-fascist Brahmanical social order

By Harsh Thakor  The massacre at Laxmanpur-Bathe of Jehanabad in Bihar on the night of 1 December in 1997 was a landmark event with distinguishing features .The genocide rightly shook the conscience of the nation in the 50th year of Indian independence. The scale of the carnage was unparalleled in any caste massacre. It was a perfect manifestation of how in essence the so called neo-liberal state was in essence most autocratic. 

एनडीए सरकार में हिन्दू राष्ट्रवाद की दिशा: मुसलमानों का हाशियाकरण जारी रहेगा

- राम पुनियानी*  लोकसभा आमचुनाव में भाजपा के 272 सीटें हासिल करने में विफल रहने के बाद एनडीए एक बार फिर नेपथ्य से मंच के केंद्र में आ गया है. सन 1998 में अटलबिहारी वाजपेई एनडीए सरकार के प्रधानमंत्री बने थे. उस सरकार के कार्यकलापों पर भी भाजपा की राजनीति का ठप्पा था. उस सरकार ने हिंदुत्व के एजेंडे के अनुरूप संविधान की समीक्षा के लिए वेंकटचलैया आयोग नियुक्त किया, पाठ्यपुस्तकों का भगवाकरण किया और ज्योतिषशास्त्र व पौरोहित्य को विषय के रूप में पाठ्यक्रम में जोड़ा. सन 2014 और 2019 में बनी मोदी सरकारें तकनीकी दृष्टि से भले ही एनडीए की सरकारें रही हों मगर चूँकि भाजपा को अपने दम पर बहुमत हासिल था इसलिए अन्य घटक दल साइलेंट मोड में बने रहे और भाजपा ने बिना रोकटोक अपना आक्रामक हिन्दू राष्ट्रवादी एजेंडा लागू किया. इसमें शामिल था राममंदिर का निर्माण और अनुच्छेद 370 का कश्मीर से हटाया जाना. इसके अलावा सरकार की मौन सहमति से गाय और बीफ के नाम पर मुसलमानों की लिंचिंग की गयी और लव जिहाद और न जाने कितने अन्य किस्मों के जिहादों की बातें की गईं.

सदन की सबसे उंची गद्दी पर बैठे यह शख्स मर्यादाओं को अनदेखा कर मुंह फेरता रहा

- मनीष सिंह*   ओम बिड़ला को जब याद किया जाएगा, तो लोगों के जेहन मे भावहीन सूरत उभरेगी। सदन के सबसे उंची गद्दी पर बैठा शख्स, जो संसदीय मर्यादाओं को तार तार होते सदन मे अनजान बनकर  मुंह फेरता रहा।  मावलंकर, आयंगर, सोमनाथ चटर्जी और रवि राय ने जिस कुर्सी की शोभा बढाई, उसे उंचा मयार दिया.. वहीं ओम बिड़ला इस सदन की गरिमा की रक्षा मे अक्षम स्पीकर के रूप मे याद किये जाऐंगे। 

नरेन्द्र मोदी देवत्व की ओर? 1923 में हिटलर ने अपनी तुलना भी ईसा मसीह से की थी

- राम पुनियानी*  समाज के संचालन की प्रजातान्त्रिक प्रणाली को मानव जाति ने एक लम्बे और कठिन संघर्ष के बाद हासिल किया. प्रजातंत्र के आगाज़ के पूर्व के समाजों में राजशाही थी. राजशाही में राजा-सामंतों और पुरोहित वर्ग का गठबंधन हुआ करता था. पुरोहित वर्ग, धर्म की ताकत का प्रतिनिधित्व करता था. राजा को ईश्वर का प्रतिरूप बताया जाता था और उसकी कथनी-करनी को पुरोहित वर्ग हमेशा उचित, न्यायपूर्ण और सही ठहराता था. पुरोहित वर्ग ने बड़ी चतुराई से स्वर्ग (हैवन, जन्नत) और नर्क (हैल, जहन्नुम) के मिथक रचे. राजा-पुरोहित कॉम्बो के आदेशों को सिर-आँखों पर रखने वाला पुण्य (सबाब) करता है और इससे उसे पॉजिटिव पॉइंट मिलते हैं. दूसरी ओर, जो इनके आदेशों का उल्लंघन करता है वह पाप (गुनाह) करता है और उसे नेगेटिव पॉइंट मिलते हैं. व्यक्ति की मृत्यु के बाद नेगेटिव और पॉजिटिव पॉइंटों को जोड़ कर यह तय किया जाता है कि वह नर्क में सड़ेगा या स्वर्ग में आनंद करेगा.