सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

Gaza to Ukraine: Strong feeling for peace amidst deaths, injuries, uprooting of people

By Bharat Dogra 

Every voice for peace is relevant, every voice for peace is needed. Even if it is only a child carrying a placard in a gathering for peace, even if it is an elderly woman struggling to keep up with a procession for peace, all are important at a time when every word, every gesture for peace, and more particularly for justice based peace, has become very important.
Yes, justice-based peace is what we really need and what must be our ultimate aim, but so tragic has been the daily toll of deaths, injuries and uprooting of people from Gaza to Ukraine and elsewhere that in such areas of high destruction there is an urgent and even desperate need to achieve at least immediate ceasefire, while justice-based solutions can be negotiated and worked out later. With the increasing destructiveness of weapons that are used, present-day war can unleash the kind of destruction within a few days which some of the worst wars earlier could not cause in months.
Hence clearly there is overwhelming need for the peace movement to be very strong and have continuity. As stated earlier, every small gesture is relevant and needed. Hence when a large number of people gather for a peace procession this is very important and welcome. However questions remain regarding what occasional gatherings and processions for peace alone can achieve on their own.
Some of the biggest peace marches and processions in western countries were seen at the time of the Iraq invasion. However well-intentioned these may have been, these did not achieve the aim of preventing the invasion, or even continuing a steady stream of protests against the invasion. A one-time gathering of protest on a fixed day helps to provide a significant symbol of the dissent and distress of sections of the people regarding any invasion, aggression or provocation, but this is not adequate for preventing invasions, other serious aggressions, the most horrible and destructive arms race and overall for bringing peace to a deeply troubled and violent world.
The dangers of many-sided aggressions, deliberate provocations and highly destructive wars today are so grave that symbolic protest, although certainly welcome and of some value at least, is just not adequate compared to what the world needs. A peace movement based mainly on symbolic protest is too weak and inadequate. The world needs a much stronger, broad-based, effective movement with continuing well-planned activities. There is much greater potential for a much bigger and more effective role of the peace movement which has not been realized yet.
Such a big, untapped potential certainly exists simply because of the strong feelings of common people everywhere, and most of all among women and children, for peace and non-violence. In increasingly darkening times, light must be sought and obtained by building on this huge potential based on the very widespread and strong yearnings for peace among people. As this writer has argued repeatedly, such a strong worldwide peace with justice movement can be created within a decade with strong horizontal and vertical linkages, on the one hand linking the yearning for peace within and in the immediate surroundings with world-level peace and disarmament, and on the other hand linking the peace movement with the movements for justice and environment protection, also with youth and gender movements.
---
The writer is Honorary Convener, Campaign to Save the Earth Now. His recent books include Planet in Peril, A Day in 2071, Protecting Earth for Children and Earth without Borders

टिप्पणियाँ

ट्रेंडिंग

हिंदी आलोचना जैसे पिछड़ चुके अनुशासन की जगह हिंदी वैचारिकी का विकास जरूरी

- प्रमोद रंजन*   भारतीय राजनीति में सांप्रदायिक व प्रतिक्रियावादी ताकतों को सत्ता तक पहुंचाने में हिंदी पट्टी का सबसे बड़ा योगदान है। इसका मुख्य कारण हिंदी-पट्टी में कार्यरत समाजवादी व जनपक्षधर हिरावल दस्ते का विचारहीन, अनैतिक और  प्रतिक्रियावादी होते जाना है। अगर हम उपरोक्त बातों को स्वीकार करते हैं, तो कुछ रोचक निष्कर्ष निकलते हैं। हिंदी-जनता और उसके हिरावल दस्ते को विचारहीन और प्रतिक्रियावादी बनने से रोकने की मुख्य ज़िम्मेदारी किसकी थी?

ગુજરાતના સ્થાપના દિવસે યાદ કરીએ ભારતના વિશ્વપ્રસિદ્ધ ગુજરાતી પુરાતત્વવિદ્ ને

- ગૌરાંગ જાની*  આજે કોઈ ગુજરાતી એ કલ્પના પણ ન કરી શકે કે વર્ષ ૧૮૩૯ માં જૂનાગઢમાં જન્મેલા એક ગુજરાતી વિશ્વ પ્રસિદ્ધ બની શકે! પણ આપણે એ ગુજરાતીને કદાચ વિસરી ગયા છીએ જેમણે ગિરનારના અશોક શિલાલેખને દોઢસો વર્ષ પૂર્વે ઉકેલી આપ્યો.આ વિદ્વાન એટલે ભગવાનલાલ ઈન્દ્રજી. ૭ નવેમ્બર, ૧૮૩૯ ના દિવસે જૂનાગઢના પ્રશ્નોરા નાગર બ્રાહ્મણ પરિવારમાં તેમનો જન્મ થયો હતો. જૂનાગઢના એ સમયે અંગ્રેજી શિક્ષણની સગવડ ન હોવાને કારણે તેમને અંગ્રેજી ભાષાનું જ્ઞાન ન હતું પણ પાછળથી તેમણે ખપ પૂરતું અંગ્રેજી જાણી લીધું હતું.

Under Modi, democracy is regressing and economy is also growing slowly

By Avyaan Sharma*   India is "the largest democracy in the world", but now its democracy is regressing and its economy is also growing slowly. What has PM Modi's ten years in power brought us? Unemployment remains high. Joblessness is particularly high among India's youth - with those aged 15 to 29 making up a staggering 83% of all unemployed people in India, according to the "India Employment Report 2024", published last month by the International Labour Organisation (ILO) and the Institute of Human Development (IHD). The BJP-led government did not provide jobs to two crore youth in a year as was promised by Modi in the run up to the 2014 general elections.

नफरती बातें: मुसलमानों में असुरक्षा का भाव बढ़ रहा है, वे अपने मोहल्लों में सिमट रहे हैं

- राम पुनियानी*  भारत पर पिछले 10 सालों से हिन्दू राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) राज कर रही है. भाजपा आरएसएस परिवार की सदस्य है और आरएसएस का लक्ष्य है हिन्दू राष्ट्र का निर्माण. आरएसएस से जुड़ी सैंकड़ों संस्थाएँ हैं. उसके लाखों, बल्कि शायद, करोड़ों स्वयंसेवक हैं. इसके अलावा कई हजार वरिष्ठ कार्यकर्ता हैं जिन्हें प्रचारक कहा जाता है. भाजपा के सत्ता में आने के बाद से आरएसएस दुगनी गति से हिन्दू राष्ट्र के निर्माण के अपने एजेण्डे को पूरा करने में जुट गया है. यदि भाजपा को चुनावों में लगातार सफलता हासिल हो रही है तो उसका कारण है देश में साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिक मुद्दों का बढ़ता बोलबाला. इनमें से कुछ हैं राम मंदिर, गौमांस और गोवध एवं लव जिहाद. 

Laxmanpur Bathe massacre: Perfect example of proto-fascist Brahmanical social order

By Harsh Thakor  The massacre at Laxmanpur-Bathe of Jehanabad in Bihar on the night of 1 December in 1997 was a landmark event with distinguishing features .The genocide rightly shook the conscience of the nation in the 50th year of Indian independence. The scale of the carnage was unparalleled in any caste massacre. It was a perfect manifestation of how in essence the so called neo-liberal state was in essence most autocratic. 

रैंकिंग: अधिकांश भारतीय विश्वविद्यालयों का स्तर बहुत गिरा, इस साल भी यह गिरवाट जारी

- प्रमोद रंजन*  अप्रैल, 2024 में भारतीय विश्वविद्यालयों की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उच्च रैंकिंग की चर्चा रही। मीडिया ने इसका उत्सव मनाया। लेकिन स्थिति इसके विपरीत है। वैश्विक विश्वविद्यालय रैंकिग में अच्छा स्थान मिलने की खबरें, कुछ संस्थानों को इक्का-दुक्का विषयों में मिले रैंक के आधार पर चुनिंदा ढंग से प्रकाशित की गईं थीं। वास्तविकता यह है कि हाल के वर्षों में हमारे अधिकांश विश्वविद्यालयों का स्तर बहुत गिर गया है। इस साल भी यह गिरवाट जारी रही है।

नोएडा में मैन्युअल स्कैवेंजर्स की मौत: परिवारों को मुआवजा नहीं, प्राधिकरण ने एफआईआर नहीं की

- अरुण खोटे, संजीव कुमार*  गत एक सप्ताह में, उत्तर प्रदेश में सीवर/सेप्टि क टैंक सफाई कर्मियों की सफाई के दौरान सेप्टिक टैंक में मौत। 2 मई, 2024 को, लखनऊ के वज़ीरगजं क्षेत्र में एक सेवर लाइन की सफाई करते समय शोब्रान यादव, 56, और उनके पत्रु सशुील यादव, 28, घटुन से हुई मौत। एक और घटना 3 मई 2024 को नोएडा, सेक्टर 26 में एक घर में सेप्टि क टैंक को सफाई करते समय दो सफाई कर्मचर्मारी नूनी मडंल, 36 और कोकन मडंल जिसे तपन मडंल के नाम से जानते हैं, की मौत हो गई। ये सफाई कर्मचर्मारी बंगाल के मालदा जिले के निवासी थे और नोएडा सेक्टर 9 में रहते थे। कोकन मडंल अपनी पत्नी अनीता मडंल के साथ रहते थे। इनके तीन स्कूल जाने वाले बच्चे हैं जो बंगाल में रहते हैं। नूनी मडंल अपनी पत्नी लिलिका मडंल और अपने पत्रु सजुान के साथ किराए पर झग्गी में रहते थे। वे दैनिक मजदरूी और सफाई कर्मचर्मारी के रूप में काम करते थे।

दाँव उल्टा पड़ा: राहुल गांधी के रूप में हम एक साधारण इंसान को नायक होते देख रहे हैं

-  अमिता नीरव  संघ औऱ बीजेपी ने राहुल गाँधी पर जो सोचकर ‘इन्वेस्ट’ किया था, उसके परिणाम गंभीर रूप से नुकसानदेह आ रहे हैं। ये थोड़ी अटपटी बात लग सकती है, लेकिन सोचिएगा कि संघ और बीजेपी ने राहुल गाँधी को जितना गंभीरता से लिया, उनकी संभावनाओं को लेकर वे जितना श्योर थे, उतना तो खुद राहुल और कांग्रेस भी नहीं थी।

બે પુખ્ત યુવક-યુવતીન જીવનસાથી બનવા નક્કી કરે તો સત્તાધારીઓના પેટમાં કેમ ગોળો ચઢે છે?

- બિપિન શ્રોફ   “લવ જેહાદ”! કેવો લાગ્યો આ  શબ્દ?  શું મારુ કે તમારું નાકનું ટેરવું તો ચઢી ગયું  નથી ને? લખનાર અને વાંચનાર બે માંથી કોઈના મા-બાપની કોઈ ગરાશ તો લૂંટાઈ ગઈ નથી ને ? એ તો જેને વીતે તેને ખબર પડે? પરોપ દેશે પાંડિત્યમ! કેમ? ખરી વાત ને? 

बिहार के ऐतिहासिक विक्रमशिला विश्वविद्यालय के खंडहरों की परिक्रमा का रोमांचक अवसर

- सुमन्त शरण  कुछ दिन पहले एक सुदूर ग्रामीण अंचल (पीरपैंती)  से तकरीबन डेढ़-दो घंटे की दूरी पर अवस्थित ऐतिहासिक बौद्ध विक्रमशिला विश्वविद्यालय (के अवशेषों) की परिक्रमा का अवसर मिला। विक्रमशीला विश्वविद्यालय की स्थापना पाल वंश के राजा धर्मपाल ने की थी। 8वीं शताब्दी से 12वीं शताब्दी के अंत तक यह विश्वविद्यालय भारत के प्रमुख शिक्षा केंद्रों में से एक हुआ करता था। कहा जाता है कि यह अपने कुछेक अत्यंत अनूठे नवाचार के चलते उस समय नालंदा विश्वविद्यालय का सबसे बड़ा प्रतिस्पर्धी था। हालांकि, मान्यता यह भी है कि अल्प अवधि के लिए दोनों विश्वविद्यालय के बीच शिक्षण एवं प्रबंधन के क्षेत्रों में घनिष्ठ पारस्परिक संबंध एवं शिक्षकों के आदान-प्रदान का सिलसिला भी रहा था। यह विश्वविद्यालय तंत्रशास्त्र की पढ़ाई के लिए सबसे ज्यादा विख्यात था। इस विषय का एक सबसे विख्यात छात्र अतीसा दीपनकरा था, जो बाद में तिब्बत जाकर बौद्ध हो गया। इसके प्रथम कुलपति ज्ञान अतिस थे।