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મોદીનો દાયકો: વિદેશી દેવામાં ભારે વધારો, જંગી વિદેશી રોકાણ; સ્વદેશી જાગરણ મંચ કુંભકર્ણ બન્યો

- પ્રો. હેમંતકુમાર શાહ 
૨૦૧૪માં ભારતનું વિદેશી દેવું ૪૬,૨૦૦ કરોડ ડોલર હતું અને તે ૨૦૨૪ સુધીમાં વધીને ૬૪,૦૦૦ કરોડ ડોલર થયું છે. આમ તેમાં ૩૮ ટકાનો વધારો થયો છે. આ રકમ આજના ડોલરના ભાવે ₹ ૫૪.૪૦ લાખ કરોડ થાય. એ ભારત સરકારના ૪૭ લાખ કરોડ રૂપિયાના બજેટ કરતાં પણ વધારે થઈ! 
ભારત સરકાર પોતે પણ દર વર્ષે વિકાસ માટે વિશ્વ બેંક અને આઇએમએફ પાસેથી ઢગલો વિદેશી દેવું લે છે. ભારત સરકારનું વિદેશી દેવું ગયા વર્ષે એટલે કે ૨૦૨૩-૨૪માં ૭.૩ લાખ કરોડ ₹ થયું હતું. મોદી સરકારે વિદેશી સરકારો પાસેથી પણ લોન લીધી છે અને લઈ રહી છે. 
જો આખા દેશનું અને કેન્દ્ર સરકારનું વિદેશી દેવું  વધતું હોય તો દેશ આત્મનિર્ભર બની રહ્યો છે એવું કેવી રીતે કહેવાય?
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નરેન્દ્ર મોદીના છેલ્લાં દસ વર્ષના શાસન દરમ્યાન એટલે કે ૨૦૧૪-૧૫થી ૨૦૨૩-૨૪ના ગાળામાં ભારતમાં લગભગ ૫૫૨ અબજ ડોલરનું વિદેશી રોકાણ આવ્યું છે. આ બધું 'મેક ઇન ઇન્ડિયા'ના રૂપાળા નામ હેઠળ વિદેશી કંપનીઓ દ્વારા થયું છે. દેશમાં અત્યારે ૪૮૦૦થી વધુ વિદેશી કંપનીઓ કામ કરે છે. 
યાદ હશે જ સૌને કે એક ઇસ્ટ ઇન્ડિયા કંપની આવી હતી ઇ.સ.૧૬૦૦માં અને દેશ ગુલામ થઈ ગયો હતો. શું મોદીએ દેશને વિદેશી કંપનીઓને બોલાવીને આર્થિક રીતે વધુ ગુલામ બનાવ્યો ન કહેવાય? 
દુનિયામાં વિદેશી રોકાણ ક્ષેત્રે ભારતનો દસમો નંબર છે. આને જ શું આત્મનિર્ભર ભારત કહેવાય? 
RSS દ્વારા કોંગ્રેસની વિદેશી રોકાણની નીતિઓ સામે લડવા સ્વદેશી જાગરણ મંચ સ્થાપવામાં આવ્યો હતો. તે મનમોહનસિંહની નીતિઓ સામે લડતો જ રહ્યો હતો. 
હવે સ્વદેશી જાગરણ મંચ લગભગ "મૌની બાબા" બની ગયો છે, અથવા બનાવી દેવામાં આવ્યો છે.

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